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Thursday, October 1, 2009

असली धर्म

बापू यही चाहते थे तुम एइसा धर्म बनाओ
सबको हो स्वीकार धर्म जो आज वही अपनाओ

पंडित करले अपनी पूजा पढ़े नमाज नमाजी
सभी उसी मालिक के बन्दे क्या पंडित क्या काजी
अपने कर्मों से शुभ आशीष दोनों ही पजाओ

पूजा पद्धति अलग रहे तो रहती है रहने दो
अल्ला राम मसीह कहे कोई कहता है कहने दो
मन्दिर मस्जिद गुरद्वारे में साझी ज्योति जलाओ

होली तीज दिवाली जिसकी उसे मना लेने दो
ईद मुबारक किस्मस दे यदि आता है आने दो
अपनी खीर खिलाकर उसको उसकी सिमई खाओ