Monday, August 29, 2016

अम्मा

                                                               
आज अम्मा बहुत उदास है | वैसे उसके उदास होने का कोई स्पष्ट कारन तो नजर नहीं आरहा है पर लगता है उन्हें बहू बेटों की याद आ रही है | अस्सी से पिच्चासी वर्ष की होंगीं अम्मा | ठीक ठीक उम्र उन्हें नहीं मालूम | अम्मा उस ज़माने की हैं  जब अधिकांश माँ बाप बिना पढ़े लिखे होते थे | कुछ समय तक तो बच्चों के जन्म की तिथि याद रखते थे परन्तु समय बीतते बीतते सब विस्मृत होजाता था | चांदी से सफेद बाल , झुर्रियों युक्त काया , वृद्धावस्था के कारण  मुरझाया चेहरा , पीछे छूट गये लम्बे अन्तराल की गवाही खुद दे रहे हैं | सुबह उठकर झाड़ू पकड़ लेना और जरूरत हो या न हो , पूरे खाली पड़े प्लाट और लान की  में सफाई करना उनकी दिन चर्या बन गयी है | और कोई काम करने की न तो उनकी उम्र है और न शारीरिक सामर्थ्य ही बची है | अगर वे कुछ काम क्र ही पातीं तो उनकी कोई भी बहू उन्हें अपने पास रखने से परहेज न करती | जब तक उनके हाथ पैर ठीक ठाक चलते थे , कहीं कोई समस्या नहीं आई | काम से उन्होंने कभी जी नहीं चुराया है , बल्कि काम के मामले में तो वे हमेशा अब्बल ही रहीं हैं |
                                   वक्त गुजरते देर नहीं लगती है | कल की ही सी तो बात है जब वे अपने गाँव में रहतीं थीं | भरा पूरा परिवार , हंसते खेलते बच्चे , गाँव में खेतीबाड़ी और पति की सरकारी नौकरी की आमदनी , सब कुछ दुरुस्त था | बड़ी बहू से तो उनका गजब का सामंजस्य था , जो घर का सारा काम काज कर  लेती थी | हाँ चूल्हे चौके के काम में कभी उनकी विशेष रूचि नहीं रही | परन्तु बाहर का बाकी काम वे ही करती थीं | पति की सरकारी नौकरी के कारन गाँव में प्रतिष्ठा थी जिसके कारन उनको भी लोग उतनी ही इज्जत देते थे |
                                  आर्थिक रूप से तो वे आज भी किसी के भरोसे नहीं हैं | सरकारी खजाने में उनका साझा है , उन्हें पारिवारिक पेंसन मिलती है जो उनके लिए पर्याप्त है | पर पढ़ी लिखी न होना अब उन्हें खल रहा है | पेंसन कितनी मिलती है , कहाँ से मिलती है , उन्हें नहीं मालूम | बीटा साल में एक दो बार बैंक लेजाकर कागज़ पर अंगूंठा लगवाता है , और बता देता है कि पेंसन मिल गयी | कितनी मिली , न कभी उसने बताया और न न उन्होंने कभी पूंछने की हिम्मत की | कैसे पूँछें कि बेटे कितनी पेंसन मिली  है , बुरा न लग जाय बेटे को कि उस पर विश्वास  नहीं है अम्मा को | सौ दो सौ  जो भी हाथ पर रख देता है , रख लेती हैं | उनको करना ही क्या है , कौनसा हाट बाजार जाना है उन्हें | पैसा खर्च करने की आदत ही नहीं रही उनकी | सौ पचास भी महीनों रखे रहते हैं उनके पास | ये तो छोटी बेटी वंदना ही है जो कभी कभी  बताती रहती है कि अम्मा तुम्हें इतने हजार मिलते हैं पेंसन के | उनकी दोनों बेटियां संपन्न हैं , इसलिए न तो उनको कभी जरूरत पडती है अम्मा से कुछ लेने की , और न देने की कभी बात आती है |
                                               अम्मा का स्वभाव बहुत सरल है | झगडा झंझट उन्हें पसंद नहीं | एक रस्ते की चली हुई हैं अम्मा | लाग लपेट नहीं जानतीं | उनका जमाना सबको साथ लेकर चलने का था | आजकल तो भाई भाई में नहीं बनती है , बाप बेटे लड़ जाते हैं , फिर औरतों का तो कहना ही क्या | वीटो अलग अलग परिवार से आतीं हैं | उनके जमाने में चार चार , छः छः औरतें एक ही छत के नीचे हिल मिलकर रह लेतीं थीं , पर आजकल तो जैसे कसम ही खाकर आती हैं , साथ न रहने की |
                                        वंदना बता रही थी कि दस साल होगये पिताजी को गुजरे | कल की सी ही बात लगती है उन्हें | उनके सामने सब ठीक था | कोई काम अधुरा छोड़कर नहीं गये वंदना के पिताजी | दोनों बेटियों और दोनों बेटों की शादी अपने सामने ही कर गये थे | वैसे अम्मा का काम उन्हें कभी पसंद नहीं आया | हमेशा कमी ही नजर आती थी उन्हें | पर उस नोंक झोंक का भी अपना एक आनंद था | अब उनकी कमी खलती है | कभी कभी तो अम्मा को वे दिन बहुत याद आते हैं , पर किससे कहें और क्या कहें , कौन सुनने वाला है उनकी बात | गाँव में जब तक थीं , साथ की बड़ी बूढियों के साथ बतिया लेती थीं \ अब तो वह भी नहीं रहा | वैसे गाँव में आज भी है सब कुछ | खेती बारी , घर बार | खेती को उठाने पर कुछ पैसा भी आता है , जिसे दोनों बेटे आपस में बाँट लेते हैं | घर पक्का बना है , जिसमें बिजली पानी की व्यवस्था भी है | घर के सामने दालान और चबूतरा है , जिस पर कभी आने जाने और बैठने वालों का ताँता सा लगा रहता था | पर आज सब ऐसी ही पड़ा है , खाली व सूना सा | गाँव में कोई रहने वाला ही  नहीं है | कौन रहे |.....  बेटियों की शादी होगयी , वर्षों पहले दोनों बेटे शहर में जाकर बस गये | गाँव का घर द्वार खाली पड़ा है , किसी की बाट जोहता सा | कौन रहने आ रहा है वहां | बेटे , नाती पोते कोई तो गाँव रहने नहीं आ सकते | सबके अलग अलग घर व कारोबार हैं |
                                                     बड़े बेटे के यहाँ रहते रहते भी बोरियत होने लगती है उन्हें | शहरों का रंग ढंग उन्हें पसंद नहीं है | यहाँ कोई किसी के पास नहीं बैठता है | गाँव की बात अलग थी , वहां तो कई औरतें और बच्चे आजाते थे उनके पास | उनके साथ बात चीत करने में समय गुजर जाता था | पर शहर में तो अकेले अकेले बैठे समय बीतता ही नहीं है | पढी लिखी होतीं तो पढने लिखने में कुछ समय गुजार लेतीं | टीवी देखना उन्हें अच्छा नहीं लगता है | आजकल टीवी पर न जाने क्या क्या उल्टा सीधा दिखाते रहते हैं | उन्हें तो यह सब अच्छा नहीं लगता है | भू बेटे अपने कामों में लगे रहते हैं , नाती पोते अपने कामों में | उनके पास बैठकर उनसे बातें करने का समय किसके पास है | ..... बिना पढ़े लिखे लोगोंका मनोविज्ञान भी अलग ही होता है | उन्हें दीं दुनिया से अधिक मतलब तो होता नहीं | सहवाग निन्यानवे पर आउट हो जाय या डबल सेंचुरी लगा दे , उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता , क्योंकि न तो उन्हें क्रिकित की जानकारी है और न फुटबाल की | न शेयर मार्किट के बढने घटने का कोई असर है और न कश्मीर में किसी आतंकी वारदात होने का | अम्मा तो काफी दिन से बच्चों के साथ शहर में रह रहीं हैं इसलिए कुछ जानने समझने भी लगी हैं , परन्तु गावों में कुछ व्यक्ति तो अपनी पूरी जिंदगी गाँव में ही बिता देते हैं , बिना कहीं आये जाए | बहुत हुआ तो पास के कसबे तक चले गये या गोवर्धन की परिक्रमा क्र आये , बस |
                                            अम्मा ने अपने लिए कभी कुछ नहीं चाहा | जो खाने को मिल दया , खा लिया और पहनने को मिल गया पहन लिया | कभी कोई शिकायत नहीं की किसी से | अपने अधिकार की बात करना या किसी काम में मीन मेख निकलने की कभी आदत ही नहीं रही उनकी | उन्हें दूसरों की पसंद नापसंद का बहुत ख्याल रहता है | इसलिए सदा डरती सी रहीं हैं दूसरों से | वही पुराणी आदत आज भी बनी हुई है उनकी | यहाँ तक की बहुओं से कुछ कहने भी डर लगता है | चाहे जो उनका मजाक बनता रहता है , परन्तु इस सबसे उन पर कोई असर नहीं पड़ता , वे अपने हिसाब से जिन्दगी जीतीं हैं | उनकी दिनचर्या आज भी व्यवस्थित है | सुबह पांच बजे बिस्तर छोड़ देना और फिर दैनिक कार्य , कुल्ला दातुन , नाहना धोना , नियमित रूप से आज भी कराती चली आरही हैं | साफ सफाई उन्हें बहुत पसंद है \ इसी का परिणाम है कि अम्मा कभी बीमार नहीं पडती हैं | उन्हें याद नहीं कि पिछली बार कब बीमार पड़ी थीं | अब तो जिसको देखो वही बीमारी पाले पड़ा है |
                           अम्मा बताती हैं कि उनके जमाने में गेहूं चने की रोटी बहुत स्वादिष्ट हुआ करती थी | गेहूं तो मालदार लोगों को ही नसीब होता था | अधिकतर लोग मोटे अनाज की रोटियां खाते थे | ग्रामीण परिवारों में तो गेंहू की रोटियां या पकवान किसी रिश्तेदार के आने पर ही बनते थे | गुर्च्नी या बेझर की रोटी सामान्यतया बनायीं जाती थी | अब तो न जाने क्या क्या खाने लगे हैं लोग , उन्हें नहीं पता \ एक बार पोती ने उन्हें बताया था कि बड़े होटलों में तो खाना बहुत मंहगा मिलता है , एक दो आदमी का ही हजारों का बिल बना देता हैं | उन्हें यह सुनकर अचम्भा होता है कि आखिर हजार रूपये का कोई कैसे खालेगा  | उनके ज़माने में तो हजार रूपये में पूरे गाँव की दावत हो जाती थी |
           अम्मा को यह बात अजीब सी लगती है कि आजकल लोग बहुत  स्वार्थी हो गये हैं | वे जब व्याहकर आई थीं तो ससुराल में उन्हें भरा पूरा परिवार मिला था | दो जेठ जिठानी और उनके कई कई बच्चे | सब लोग शामिल ही रहते थे | एक दो साल बाद अचानक किसी बीमारी से सभी जेठ जिठानियां राम को प्यारे हो गये | तब उनकी आठ लड़कियां और कई लड़कों की परवरिश , शादी व्याह भी वंदना के पिताजी ने ही किये थे | उन्हें यद् है कि वंदना के पिताजी द्वारा अपने भाइयों के बच्चों के लिए ये सब करने में उन्होंने कभी कोई बाधा नहीं डाली थी और न कभी कोई शिकायत की थी | आज के जमाने में तो यह स्वप्न जैसा लगता है | आजकल तो नई बहू आते ही अपने पति पर अलग होजाने का दबाब डालने लगती है जैसेशादी के बाद  अन्य परिवारी जनों से उसके पति का कोई सम्बन्ध ही न रह गया हो | वह भूल जाती है कि उसके पति पर अन्य परिवारी जनों का भी कुछ हक बनता है , जिन्होंने उसके पति को पलने पोषने में अपने खून पसीने की कमाई और कीमती समय को लगाया था |मानवीय संबंधों में अपनत्व की भावना का घटना ही आज की पारिवारिक विघटन की स्थिति के लिए जिम्मेदार है |
                                            अम्मा पिछले छः माह से अपनी बेटी वंदना  के घर पर है  पर उनका मन बेटों में ही लगा रहता है | बेटी के घर पर कोई मजदूर काम करने आये या कामवाली चौका बर्तन के लिए आये , अम्मा मौका मिलते ही उनसे बतियाने लगती हैं  और यह बताना नहीं भूलतीं की उनके कितने बेटे हैं और कौनसा बेटा आजकल क्या करता है | अभी पिछले दिनों की बात है दो तीन मजदूर पुताई का कम करने आये थे , अम्मा अवसर निकालकर उनके पास बैठ गयीं और अपने बेटों की पूरी कहानी बताने लगीं | उनकी बैटन में बेटों की कोई बुराई शामिल नहीं थी बल्कि एक से बढ़कर एक बड़ाई किये जा रही थीं की कौनसा बीटा किस पद पर है और किस बेटे के कितने बच्चे हैं , वे क्या क्या कर रहे हैं आदि आदि | अंत में यह बताना नहीं भूलतीं कि बेटी के घर तो वे कुछ दिन के लिए घूमने  आयीं हैं , एक दो दिन में चली जायेंगीं | किसी बेटे की बुराई की बात अम्मा की जुबान पर आती ही नहीं है , हाँ बहुओं की बुराई वे कभी कभी डरते डरते कर लेतीं हैं | अम्मा को इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि एक बेटे ने तो लगभग तीन साल से उनकी कोई खैर खबर नहीं ली है , यहाँ तक कि फोन पर  भी बात नहीं की है | अम्मा उसकी सबसे बड़ी प्रशंसक हैं | कहती हैं ,” हम़ा औ बिजन्दरू भौतु अच्छौ ऐ ...... मेई भौतु चिंता रखतुऐ..... परि ग्वापै टाइम नाइ आइबे कौ “ | दूसरा बीटा अम्मा को अपने पास रख तो लेता है पर उसकी पत्नी खूब खरी खोटी सुनती है अम्मा को | बेचारी अम्मा सुनने के अलावा कर ही क्या सकती है | अम्मा का स्वभाव ही ऐसा है कि वे किसी से कुछ कह नहीं पातीं हैं | बहुओं से तो इल्कुल भी नहीं | परेशां होकर अम्मा कभी गाँव में अकेले रहने चली जाती हैं , कभी बेटियों के पास अथवा अपने मैके चली जाती हैं जहाँ अब उनका कोई भाई या भाभी जीवित नहीं है केवल उनके बच्चे रहते हैं |
                                            पिछले कई साल से अम्मा अपने बड़े बेटे जगबीर के पास रह रहीं थीं कि बेटे की पत्नी बीमारी के कारण अस्पताल में भरती हो गयी | वहां उसकी तंग का ऑपरेशन होना था | अम्मा भी बहू बेटे के साथ हॉस्पिटल आगयी वहां बेटी वंदना के अपनी भाभी को देखने जाने पर अम्मा उसके साथ चली आयीं |  उस बात को लगभग छः महीने होने को हैं , अम्मा तब से बेटी के पास ही है | इस बीच बड़ा बीटा दो बार अम्मा को लिवाने की औपचारिकता निभाने आचुका है |
                                                        पहली बार दो महीने बीतने पर आया था | बेटे के आने पर अम्मा का उत्साह देखने लायक था | अम्मा में एक दम नये जोश का संचार दिखाई देने लगा था | उनकी ख़ुशी छुपाये नहीं छुप रही थी | इसका कारन यह नहीं था कि अम्मा को बेटे के घर पर किसी बड़े स्वागत की आशा थी या वहां उनकी कोई विशेष आवभगत होने की सम्भावना थी , बल्कि उत्साह का कारण बेटे का लिवाने आना मात्र था क्योंकि जब बेटे की बहू हॉस्पिटल में भारती थी तो हॉस्पिटल से बेटी के साथ  
आने के बाद बहू को फिर हॉस्पिटल देखने जाने पर अम्मा की खूब छीछालेदर हुयी थी | हुआ यह था कि अम्मा के मुंह से भूल से छोटी बहू की प्रशंसा की बात निकल गयी थी | फिर क्या था बीमारी की हालत में भी बड़ी बहू ने अम्मा को खूब खरी खोटी सुनायीं थी और यह भी खा था कि वही भूभर डालेगी इस डोकरी पर इसका और कहीं ठिकाना नहीं है | उनका बेटा भी वहां उपस्थित था जो मूकदर्शक बना यह सब देखता और सुनता रहा था | इस घटना के बाद वह पुनः बेटी के साथ आगयी थी और अम्मा को बेटे के लिवाने की आशा समाप्त सी हो गयी थी | पर जब बेटा लिवाने आगया तो अम्मा को मानो संजीवनी मिल गयी थी |
                                              खैर अम्मा बेटे के साथ तो नहीं गयीं , परन्तु बेटे के आने से ही अम्मा को बड़ा संबल मिल गया था | ये अलग बात थी की बेटा मन से अम्मा को लेने नहीं आया था , केवल लोक लाज के कारण औपचारिकता निभाने आया था | उसकी इस मनस्थिति को भांपकर बेटी ने अम्मा को और कुछ दिनों के लिए अपने पास ही रख लिया था | लेकिन अम्मा बेटे के लिवाने आजाने मात्र से इतनी प्रसन्न थी कि उनकी बौडी लेंग्वेज ही बदल गयी थी | अम्मा के हाव भाव यह बता रहे थे कि अब वे निराश्रित नहीं हैं , उनका बेटा उनके साथ है , जैसे कह रही हों कि वे बिना बात के ही ण जाने क्या क्या सोचने लगी थी | उनको क्या पता था कि बेटा सुरक्षात्मक पारी खेलने में लगा था | जब वह आश्वस्त होगया कि अब अम्मा उसके साथ  नहीं जा रहीं हैं , तो शेखी बघारने के अंदाज में वंदना से कहने लगा कि हम मना थोड़े ही करते हैं , अम्मा जहाँ भी जिसके साथ रहना चाहे रहे | आखिर वह अम्मा तो सभी की है , बेटों की भी और बेटियों की भी | पर अम्मा है बहुत बुरी , मेरे बच्चों को कभी एक पैसा भी नहीं देती है , इसलिए मेरे सिवाय मेरे घर पर अम्मा को अपने पास रखने के पक्ष में नहीं रहता है | अब मेरी तो माँ है इसलिए रखना मजबूरी है | उस समय मन में आया कि इससे पूंछा जाय कि जब अम्मा की पूरी पेंसन तुम्र्ख लेते हो तो अम्मा किसी को कहाँ से कुछ देगी | परन्तु यह सोचकर कि इसका अन्यथा कुछ अर्थ न लगाया जाय , यह नहीं कहा |
                                           आज दूसरी बार जगबीर लगभग चार महीने बाद फिर आया है , अचानक प्रकट होने के अंदाज में | आते ही अम्मा से न जाने क्या कह दिया है कि अम्मा बिना देरी के अपना बैग संवारने लगी है | मुझे लग रहा है कि फिर पुरानी कहानी दुहरायी जाएगी , क्योंकि वह अम्मा को अपने साथ लेजाने से रहा | वंदना घर पर नहीं है , बाजार से सब्जी लेने गयी है | उसके आने के बाद ही कोई बात चलेगी | मैं इन मामलों में तटस्थ रहता हूँ क्योंकि न तो मुझे अम्मा के रुक्जाने से कोई परेशानी है और न उनके चले जाने से कोई दुःख | बल्कि मैंने ही वंदना को अपनी अम्मा को अपने साथ रख लेने के लिए उत्साहित किया था | जगबीर इधर उधर की बात करता रहा | मैंने भी जानबूझकर अम्मा का विषय नहीं छेड़ा | आखिरकार वह अम्मा की बात पर आ ही गया | ........”  सही बात तो यह है कि मैं तो अपना फर्ज निभाने आ जाता हूँ , जबकि मेरे परिवार का अन्य कोई सदस्य यह नहीं चाहता कि डोकरी मेरे घर पर रहे |”  ........ यह तो बड़े दिल की बात है ..... मैंने कटाक्ष करने के अंदाज में कहा | अब डोकरी किस मतलब की है | कोई काम तो होता नहीं है अब | जब तक काम कराती थी , तब तक तो बेचारी बहुएं बड़े अधिकार के साथ रखती ही थीं | अब कैसे रखें ..... | वार्तालाप चल ही रहा था कि वंदना भी आगयी |
                                       मेरे द्वारा चाय आदि के लिय कहने पर जगबीर अचानक जल्दी दिखाने  लगा | बोला मुझे शीघ्र जाना है , चाय नहीं पियूँगा | बात फिर अम्मा के विषय में ही होने लगी | वंदना बोली “ जोगेंदर का फोन आया था , उसने मुझसे कहा है कि जीजी इधर आरही हो तो अम्मा को भी साथ लेते आना | वंदना ने यह भी बताया कि उसे गुरगांव किसी काम से जाना है , तुम कहो तो अम्मा को भी साथ ले जाऊं | अम्मा जोगेंदर के पास रह आएगी |.......... “ तो अम्मा फिर वहीं रहे | तीन साल से मेरे पास है तब तो उसने या उसकी पत्नी ने कभी अम्मा से बात भी नहीं की | ....... देख लेना एक महीने में छुडवा देगी उसकी बहू ...... बहुत मक्कार है , मैं उसे जनता हूँ “ जगबीर रहस्योदघाटन करता सा बोला |
वह आक्रोशित सा फिर बोला “ अम्मा जा क्यों रही है , लिवाने आया है क्या | इस तरह बिना लिवाने आने पर उसके घर जाना ठीक नहीं है , फिर आगे अम्मा की इच्छा ..... पर ये समझ ले कि ऐसा न हो कि दो महीने बाद ही लौटकर आ जाए ..... फिर मैं नहीं रखने का .... चाहे जहाँ रहें | “
                           अब तक तो अम्मा चुप थी | पर अब बोलना जरूरी लगने लगा था , क्योंकि अम्मा नहीं चाहती थीं कि जगबीर को ऐसा लगे कि अम्मा जोगेंदर के पास जाना चाहती हैं | यद्यपि दिल से वे जोगेंदर के पास जाने की सुनकर ही बहुत उतावली थी जाने के लिए | ....... “ नाइ बेटा , मई तो बिलकुल न जाउंगी ते बिना कहे ....... सौ बेर बुलायवे आवैगौ तौ जाउंगी “ |
                           अंत में यह हुआ कि वंदना ने जैसे ही औपचारिकता निभाने के लिए यह कहा कि अम्मा को और अभी यहाँ रुक लेने दो , तो जगबीर को जैसे बिन मांगे मुराद मिल गयी हो , वह तुरंत इस प्रस्ताव पर राजी हो गया | और दो मिनट में ही बिना चाय पिए ही चला गया | उसके जाते समय विजयी होने जैसा भाव था | अम्मा ने दो तीन बार न जाने क्या क्या आशीष दिए और जब तक वह दिखाई देता रहा , गेट पर ही खडी रही |
                               जगबीर के जाने के बाद वंदना ने अम्मा से कहा | “ अम्मा ठीक ही तो कह रहा था जगबीर | तुम्हें बिना बुलाये जोगेंदर के घर नहीं जाना चाहिए | जोगेंदर लिवाने आये तब ही जाना |
    “ नाइ लाली मैं तौ चलूंगी ते साथ , मे काजें तौ दोनों एकु जैसे हें , मोइ का कन्नौ है जाते ‘ अम्मा एक दम पलती मरते हुए बोली |
                                       असल बात यह है कि अम्मा किसी के सामने चाहे जो कहदे , पर वास्तविकता यह है कि यदि अम्मा के दिल को खोलकर  देखा जाय तो उसमें जोगेंदर , जगबीर अथवा उनके बेटों के आलावा कुछ भी नहीं मिलेगा , इतना तय है |
                      एक दिन शाम को में आफिस से आया तो अम्मा लान में चारपाई पर कुछ उदास सी ध्यान मुद्रा में बैठी थीं | पूंछने पर वंदना ने बताया कि आज सुभ से ही अम्मा मोहन के यहाँ जाने के लिए व्यग्र हैं | मोहन , अम्मा का नाती यानि वंदना का भतीजा , हमारे बगल वाली कालानी में ही रहता है | कई महीने से अम्मा हमारे घर पर हैं पर उनके नाती ने कभी उन्हें देखने आने की आवश्यकता नहीं समझी | लेकिन अम्मा उससे मिलने के लिए बेचैन हैं | आखिर वंदना उन्हें शाम को नाती से मिलाने के लिए ले गयी | जब रात के आठ साड़े आठ बज गये तो मुझे लगा कि शायद अम्मा को नाती ने आने नहीं दिया है , वंदना अकेली आती ही होगी | पर ये क्या ये तो माँ बेटी दोनों चली आरही हैं | अम्मा जब कमरे में आगयीं तो मैंने कुरेदने के अंदाज में कहा , अब तो मिल आयीं नाती से , खूब आवभगत की होगी नाती ने |
   अम्मा दोनों हाथ इस अंदाज में ऊपर करते हुए , मानो वे तो ऐसे ही वंदना के कहने पर चली गयीं हों , बोलीं .... सबु ऐसे ई हें , कोई घाटि नाइ , मेंतौ कह दई तू ऐ सौ तेरौ बापु हूँ ऐसौ “ |
         अरे क्या बात हो गयी अम्मा , वह लड़का तो बहुत अच्छा है |
“ नाइ मोइ पसंद नाइ , मैंने पेन्सिल निकारि वे की कही , सो ग्वाने तौ साफु नाई कद्दई “ अम्मा नाराजगी दिखाते हुए बोली | अम्मा के दूसरे कमरे में जाने के बाद वहां वंदना आगयी | तो मैंने जानना चाहा कि अम्मा क्यों नाराज हैं , मोहन के घर पर ऐसा क्या हो गया | वंदना आश्चर्य व्यक्त करते हुए बोली कि ऐसा तो कुछ नहीं हुआ मोहन के घर | बल्कि नाती के खूब उलटी सीढ़ी सुनाने के बाबजूद अम्मा भी अम्मा ने कई बार सिर पर हाथ फिर फिर कर आशीर्वाद दिया था और न जाने क्या क्या बन जाने और तनखा बढ़ जाने का आशीर्वाद देकर आयीं हैं | ...... मुझे लगा कि अम्मा इतनी सीढ़ी और न समझ नहीं हैं जितना हम लोग समझते हैं |
                  वंदना कभी कभी इस बात पर नाराज होजाती है कि अम्मा में अपने पराये का भेद बहुत अधिक है | अपने अर्थात बेटे और बेटों का परिवार , बाकी सब उनके लिए पराये हैं | बेटियों को तो पराया धन मानने की बात वह बचपन से सुनती और मानती  आयीं हैं | ऊपर से दिखने के लिए वे चाहे जो कहदें परन्तु केवल अपने बेटों और नाती पोतों को ही अपना मानतीं हैं | उनके व्यव्हार में यह बात हर बार स्पष्ट दिखायी दे जाती है | उनका मन्ना है कि , जो कुछ भी जमीन जायदाद ,गहने या उनको मिलने वाली पेंसन पर केवल बेटों का ही हक होता है | बेटे उनको अपने पास रखें या न रखें , उनके इस हक पर इससे कोई अंतर नहीं पड़ता है | अम्मा की यह सोच इतनी गहरी है कि इसे कोई बदल नहीं सकता है  |
                               एक बार अम्मा का मन लेने के उद्देश्य से वंदना ने उनसे कहा कि अम्मा तुम्हें दस हजार से अधिक पेंसन मिलती है , इसे तुम अपने बेटों के आलावा गाँव में  किसी को भी देने लगोगी तो वह तुम्हें वह ख़ुशी ख़ुशी अपने पास रखने को तैयार हो जायेगा , फिर तुम ऐसा क्यों नहीं करती हो | .....
अम्मा तपाक से बोलीं , “ नाइ लाली , पेन्सिल तौ जगबीर और जोगिन्दर की है , वेई लिंगे ... औरे कैसे दे दिन्गी ...... मोहि का कन्नौ है पेन्सिल फेंसिल ते , में तौ भतीजेनु कह दई है , भूआ खूब रह तू हमाये पास ... हमनु नाइ लेनी तेई पेन्सिल ...... और मरेगी तौ पूआऊ कद्दिंगे ... चीज ऊ ते छोरनु देदिंगे “ |
तो अम्मा की दिली इच्छा तो यह है कि बेटे अपने पास रखें या न रखें , वे खिन भी रहलें , पर जमीन जायदाद और गहने ( शरीर पर पहने हुए ) , पेंसन आदि सभी बेटों को ही मिलनी चाहिए |
                         अंत में तय हुआ कि एक बार छोटे बेटे जुगिंदर को फोन करके पूंछ लिया जाय कि वह अम्मा को लिवाने कब आएगा | अम्मा का उसके पास जाने का बहुत मन जो है |
  फोन जुगिंदर ने ही उठाया | वंदना ने उसे बताया कि अम्मा का उसके पास आने का मन है और यह कि जगबीर अब अम्मा को नहीं रखना चाहता है | फोन का स्पीकर ओन था जिससे दोनों ओर का वार्तालाप सुनाई दे | उधर से हूँ हाँ होती रही | अचानक फोन पर महिला के बात करने का स्वर आने लगा क्योंकि फोन जुगिंदर की बहू रानी ने ले लिया था | उसने कहा ‘ जीजी हमसे तो सच्ची बात आती है , अम्मा जहाँ चाहें वहां रहें , उनकी मर्जी | यहाँ आना चाहतीं तो जरूर आजातीं | अम्मा को रथ थोड़े ही भेजेंगे बुलाने को | .... साफ है की अम्मा यहाँ आना ही नहीं चाहती हैं “ |  और दूसरी तरफ से रिसीवर रखने की आवाज आई | फिर कई बार फोन मिलाने का प्रयास करने पर भी फोन नहीं  मिला |
                                                आज अम्मा को तीन साल होगये हैं यहाँ रहते हुए | बेटी का दिल नहीं स्वीकारता कि अम्मा को अपनी तरफ से कहीं छोड़कर आया जाय |अब  बेटों के फोन आने भी बंद हो चुके हैं | पता चला है की जमीन व मकान को बेटे आपस में बाँट चुके हैं | पेंसन अम्मा के खाते में बैंक में जमा हो रही है अम्मा को यह पता है | खाते से पेंसन के पैसे निकलने के लिए न तो कभी अम्मा ने कहा और न कभी हमने ही इस बात की चर्चा की , हाँ जीवित रहने का सबूत ट्रेजरी में देने के लिए साल में एक बार चले जाते हैं और संभवत बेटे इसका पता क्र लेते होंगे | पर अम्मा इतने पर भी कभी अम्मा बेटों से नाराजगी की बात कभी जुबान पर नहीं लैटिन हैं और न उनकी इस मान्यता पर कोई असर पीडीए है कि पेंसन पर जगबीर और जुगिन्द्र का ही हक बनता है |     
                                                                      


आसाराम और आस्मुहम्मद

                                                      
                                                  आसाराम और आस मुहम्मद दो मित्र हैं जो दो पडौसी  गावों के रहने वाले हैं  | आसाराम के घर पर  शादी समारोह हो या  दशठोन  की दावत , आस मुहम्मद न केवल उपस्थित रहता है बल्कि सक्रिय  भागीदारी भी करता है | इसी प्रकार आस मुहम्मद के घर पर उसके गाँव में होने वाले प्रत्येक आयोजन में आसाराम का रहना भी अनिवार्य है | दोनों की मित्रता बचपन से ही चल रही है जो दोनों गाँव के लोगों के अतिरिक्त आसपास के गाँवों में भी उदाहरण  बन चुकी है | किसी भी सार्वजनिक आयोजन में इन दोनों को साथ साथ देखा जा सकता है क्योंकि दोनों गावों में से किसी में भी होने वाले  हरेक आयोजन में इन दोनों का होना प्रायः निश्चित सा है | यहाँ तक कि आसाराम के सभी रिश्तेदार आस मुहम्मद को और आस मुहम्मद के सभी रिश्तेदार आसाराम को पहिचानते  हैं |  आसाराम का गाँव हिन्दुओं का है जबकि आस  मुहम्मद के गाँव में सभी मुसलमान हैं |
                                             कई बार ऐसे अवसर आये हैं जब आसाराम के गाँव में उसके घर पर  होने वाले फंक्शन में लोग आपस में बात  करने में ऐसा कुछ  कह जाते हैं जो किसी भी मुसलमान को सुनने में अच्छा  न लगे पर  आस मुहम्मद ऐसी बातों  को सुनकर भी अनसुना कर देता है | इसी तरह जब आसाराम आस मुहम्मद के गाँव में होने वाले जलसों में होता है तो वहां उपस्थित लोग भी आसराम के समक्ष इसी प्रकार की स्थिति पैदा कर देते हैं , पर वह भी उसे भीड़ की मानसिकता समझकर उपेक्षित कर  देता है | लोगों की यह आदत होती है कि वे दूसरों की आलोचना में बड़ी रूचि लेते हैं और यदि बात धर्म की हो रही हो तो अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानकर प्रायः दूसरे धर्म की आलोचना करते हैं | आसाराम और आस मुहम्मद अलग अलग धर्मों के हैं इसलिए उन्हें इस तरह की स्थिति का कई बार सामना करना पड़ता है पर वे अपनी परिपक्व सोच के चलते उससे प्रभावित नहीं होते |  दोनों मित्र एक दूसरे की भावनाओं को भलीभांति समझते हैं इसलिए उनमें कभी मत वैभिन्य नहीं होता है | वैसे दोनों गाँव के लोगों में भी आपसी भाईचारा है और एक दूसरे के काम आने में अथवा खेती किसानी के काम में आपस में सहयोग करने में कोई परहेज नहीं है | हिन्दुओं के त्यौहारों जैसे होली दिवाली पर पडौस के गाँव के मुसलमान भी शामिल होते हैं और होली पर खूब होली के रंगों में रंग जाते हैं | बल्कि होली की टोली जब गाँव में निकलती है तो ढोलक बजाने का जिम्मा मुसलमानों के गाँव के सुल्तान पर ही होता है क्योंकि वह ढोलक बजाने में पारंगत है | हर वर्ष होने वाली राम लीला में आसाराम राम की भूमिका निभाता है  और आस मुहम्मद लक्ष्मण की भूमिका निभाता है | लक्ष्मण परशुराम संवाद में तो आस मुहम्मद द्वारा निभायी जाने वाली भूमिका को लोग बेहद पसंद करते हैं | उस समय कोई भी यह अनुमान नहीं लगा सकता कि इस भूमिका को निभाने वाला हिन्दू न होकर एक मुसलमान युवक है | ईद के पर्व पर हिन्दू लोग अपने मुसलमान मिलने वालों के घर जाकर उनकी ख़ुशी में शामिल होते हैं और बड़े  चाव से ईद पर बनी  सिमई खाते हैं | मंदिर के सामने के मैदान में हर वर्ष ईद का मेला लगता है जिसमें हिन्दू लोग भी उत्साह से सहभागी बनते हैं |     
                                             दोनों गावों के मध्य एक बड़ी पोखर है जिसके चारों  तरफ खुली परती जमीन पड़ी है | उसी मैदान में एक प्राइमरी पाठशाला , पंचायत भवन व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र  है | ये सभी सुविधाएँ दोनों गाँवों के लिए साझा सुविधाएँ हैं | स्कूल में दोनों गाँवों के बच्चे साथ साथ पढ़ते हैं और आगे पड़े मैदान में क्रिकिट, कबड्डी और फुटबॉल  आदि खेल भी खेलते हैं | तालाब  में जब वरसात का पानी भर जाता है तो दोनों गाँव के बच्चे उसमें तैराकी सीखते हैं |  उसी मैदान के एक किनारे पर प्राचीन शिवमंदिर बना हुआ है जिसमें हिन्दुओं के गाँव के लोग पूजा पाठ करने आते हैं | बगल के गाँव के मुसलमान भी मंदिर के चबूतरे पर बैठे रहते  हैं | मंदिर में कोई आयोजन होता है तो प्रसाद के वितरण के समय  मुसलमान भी प्रसाद ग्रहण करने में संकोच नहीं करते हैं | हाँ  कोई मुसलमान मंदिर के अन्दर नहीं जाताहैं  और न पूजा पाठ में  भाग लेता है | दोनों गाँव के लोगों की सकल सूरत व बोली चाली  में भी कोई खास फर्क नहीं है | सभी लोग देखने में एक जैसे ही लगते हैं फिर वह हिन्दू हो या मुसलमान |  जो मुसलमान लम्बी दाडी रखते हैं या गोल टोपी पहन  लेते हैं वही  पहिचान में आते हैं कि वे हिन्दू नहीं मुसलमान  हैं | बड़े बूढ़े बताते हैं कि पहले उस गाँव के लोग भी हिन्दू ही थे जिन्होंने मुसलमान धर्म अपना लिया था | धर्म परिवर्तन का क्या कारण  था इस विषय में कई किवदंतियां प्रचलित हैं पर इस बिंदु पर कभी कोई गम्भीर चर्चा नहीं करता है |
                                                                पर पिछले दस बीस साल से धीरे धीरे दोनों गावों की मारी हालत व जनसंख्या घनत्व में अंतर आता गया है,  जो अब साफ साफ दिखने लगा है | मुस्लिम आबादी वाले गाँव में गरीबी और अशिक्षा अधिक है |  एक पड़े लिखे वयोवृद्ध व्यक्ति बताते हैं कि चालीस पचास वर्ष पहले दोनों गावों में सभी परिवारों में पांच  से लेकर सात आठ तक बच्चे होना सामान्य था  पर अब शिक्षा के प्रसार के बाद हिन्दुओं के गाँव में तो परिवार दो तीन बच्चों तक सीमित होने लगे हैं पर मुस्लिम आबादी वाले गाँव में ऐसा नहीं हुआ है  | साक्षरता व शिक्षा का प्रतिशत हिन्दुओं के गाँव में काफी सुधरा है | दूसरी ओर मुस्लिम आबादी वाले गाँव में साक्षरता व शिक्षा का प्रतिशत हिन्दुओं के गाँव से काफी कम है | हर परिवार में बच्चों की संख्या अधिक होने के कारण खेती किसानी करने वाले परिवार मजदूर परिवरों में बदलने लगे हैं | हिन्दुओं के गाँव में भी खेती बंट जाने से परिवारों की आर्थिक गतिविधि पर असर पड़ा है पर मुसलमानों के गाँव में यह प्रभाव  स्पष्ट दिखाई देने लगा है  | निरक्षर मुस्लिम माँ बाप बच्चों को स्कूल भेजना जरूरी नहीं समझते और कच्ची उम्र में ही उन्हें छोटे मोटे धन्दों में लगा देते हैं | मुसलमानों के जो बच्चे स्कूल आते भी हैं उनमे से काफी बच्चे प्राइमरी के बाद ही पढाई लिखाई छोड़ देते हैं |
                                                 आस मुहम्मद और आसाराम दोनों ग्रेजुएट हैं और शिक्षा विभाग में प्राइमरी के टीचर हैं | कई बार वे दोनों मित्र बैठकर इस बिंदु पर चर्चा भी करते हैं कि आखिर मुसलमानों का गाँव शिक्षा व आधुनिकता की दौड़ में पीछे क्यों छूटता जा रहा है | आस मुहम्मद क्योंकि पढ़ा लिखा है इसलिए उसने तो अपने बच्चों की संख्या दूसरों की तुलना में सीमित रखी है तथा अपने सभी बच्चों को शिक्षित भी करा रहा है | आस मुहम्मद आसाराम से कोई बात छुपता नहीं है | वह यह स्वीकार करता है कि शिक्षा का प्रसार कम होपने के कारण  उसके धर्म के लोगों में दकियानूसी  कुछ अधिक है | उसे स्वीकार करने में संकोच नहीं होता कि गाँव की मस्जिद का मौलवी जो खुद मदरसे का पढ़ा है , कोई विधिवत शिक्षित व्यक्ति नहीं है | उसने लोगों के मन में यह बात बिठाल दी है कि इस्लाम में बच्चों की पैदावार रोकना हराम है | आस मुहम्मद लोगों को समझाने का प्रयास भी करता है पर वे आस मुहम्मद जैसे पढ़े लिखे लोगों के समझाने पर भी नहीं समझते | मौलवी ऐसे लोगों को  दीनभ्रष्ट बताकर लोगों को  उनसे दूर रहने के लिए कह देता है | आसाराम ने भी अपने मित्र आस मुहम्मद के साथ मिलकर उसके गाँव के लोगों को समझाने का प्रयास किया है पर चाहकर भी वे  गाँव के अशिक्षितऔर  अनपढ़ लोगों की सोच नहीं बदल पा रहे हैं | मौलवी ने गाँव की मस्जिद के पास ही एक कमरे में मदरसा चालू कर दिया है जिससे प्राइमरी स्कूल में आने वाले मुस्लिम बच्चों की संख्या और कम हो गयी है |  
                                                        एक बार आसाराम को किसी निजी कार्य से तीन चार दिन के लिए गाँव से बाहर जाना पड़ता है | वह वहां से  जब  गाँव वापस आता है तो गाँव की स्थ्तित देखकर दंग  रह जाता है | गाँव के बाहर बने प्राइमरी स्कूल में पुलिस वालों की भीड़ दिखाई देती है | सामने मैदान में पुलिस की कई गाड़ियाँ खडी हैं , एक पीएसी का ट्रक भी खड़ा दिखाई देता है | सडक के किनारे बनी मोती सिंह की दुकान जली हुई दिखती  है | सडक पर कई जगह फटे कपड़ों के टुकड़े पड़े हैं | सडक और उसके आस पास की जमीन  कई जगह रक्त से लाल हो गयी है | शिव मंदिर के बाहर भी पुलिस तैनात  है | अन्य  दिनों स्कूल और उसके सामने का  मैदान बच्चों के शोर गुल से जीवंत रहता था पर  वहां आज अजीब सी स्तब्धता है | गाँव के लोग कम ही दिखाई  दे रहे हैं | जो हैं भी वे डरे सहमे से हैं | आसाराम एक व्यक्ति के पास जाकर प्रश्नभरी नजरों से देखता है तो वह आसाराम को पिछले दो तीन दिनों में घटी घटना का जो विवरण देता है उसे जानकर वह हतप्रभ रह जाता है |
                                          हुआ यह था कि जिस दिन आसाराम गाँव से बाहर गया था उसी रात को दोनों गावों के मध्य पोखर पर बने शिव मंदिर में किसी ने गाय के  गोस्त के टुकड़े रख  दिए थे | जब अगली सुबह औरतें और आदमी शिव मंदिर में पूजा करने  के लिए गये तो मंदिर में मांस पड़ा  देखकर अचंभित होगये और पूजा पाठ भूलकर शोर मचाने  लगे | मंदिर में लोगों को चिल्लाते देखकर किसी उन्हौनी की आशंका में आस पास उपस्थित लोग भी मंदिर की ओर दौड़ने लगे | मंदिर में मांस मिलने की खबर पूरे गाँव में फ़ैल गयी | मंदिर पर लोगों की भीड़ बढ़ने लगी | लोग तरह तरह की आशंका व्यक्त करने लगे | कोई बोला यह तो हमारे देवता का अपमान है  किसी ने जान बूझकर शिव मंदिर को अपवित्र किया है  | जितने लोग उतनी बातें | तभी किसी ने खबर फैलादी कि यह तो मुसलमानों का काम है | वे मंदिर को अपवित्र करके मन्दिर को  यहाँ से हटवाना चाहते हैं और मंदिर की जमीन पर कब्ज़ा करना चाहते हैं | किसी ने याद दिलाया कि कैसे इस घटना के कुछ दिन पूर्व मुसलमानों के गाँव के लोगों ने उसी मैदान में मंदिर के बराबर में मस्जिद बनाने का प्रयास भी किया था जिसेउस समय लोगों को  समझा बुझाकर टाल दिया गया था | अब तो कुछ लोगों ने दोनों घटनाओं को जोडकर मुसलमानों की स्पष्ट साजिश होने का निष्कर्ष निकाल लिया | इस बात को लेकर लोग उत्तेजित होने लगे और बदला लेने की बात करने लग |
                                          उधर मुसलमानों के गाँव में बनी मस्जिद में सूअर का मांस पाए जाने पर पूरे गाँव के मुसलमान इकट्ठे हो गये थे  और किसी हिन्दू की करतूत मानकर इस्लाम की तौहीन करने का आरोप लगाने लगे थे  | इसी दौरान किसी ने मंदिर पर हिन्दुओं की भीड़ इकट्ठी होने की खबर वहां एकत्रित लोगों को बता दी | अविश्वास और आशंका की भावना बलवती होने लगी और भीड़ में से किसी ने इस्लाम खतरे में होना बताकर अल्ला हो अकबर का नारा उछाल  दिया | लोगों में इस अपमान का बदला लेने की आवाज उठने लगी | फिर  तो  अल्ला हो अकबर के नारों के साथ भीड़ मंदिर की ओर बढने लगी | कुछ अति उत्साही लोग भागकर अपने घरों से  लाठी और बल्लम भाले भी निकाल कर  ले आये  | मंदिर पर तो भीड़ पहले से इकट्ठी थी ही , दूसरी तरफ से मुसलमानों की भीड़ आते देख लोगों को विस्वास होगया कि इस में जरूर  मुसलमानों की ही साजिश है  |  उन्होंने  औरतों और बच्चों को वहां से घर भेज  दिया और पुरुष लोग  लाठी डंडे आदि हथियार लेकर लड़ने को तैयार हो गये | दोनों ओर की भीड़ पर जूनून सा सवार होगया था | उत्तेजना और क्रोध में मनुष्य का विवेक नष्ट होजाता है यही हुआ | दोनों ओर की उन्मादी भीड़ में से किसी ने एक दूसरे से कुछ भी जानने की आवश्यकता नहीं समझी |  परिणाम यह हुआ कि मंदिर के सामने मैदान में दोनों ओर की उन्मादी भीड़ के बीच  भयंकर दंगा शुरू होगया | लोग धर्मांध हो एक दूसरे पक्ष की भीड़ पर टूट पड़े |  किसी का हाथ टूटा , किसी के पैर में फ्रैक्चर हुआ और किसी का सर फटा | वही लोग जो कल तक एक दूसरे के साथ उठते बैठते थे , काम करते थे , खाते पीते थे  आज एक दूसरे के खून के प्यासे हो गये थे | शिक्षा के मंदिर के सामने का मैदान वहशी भीड़ के संघर्ष का अखाड़ा बन गया था | दोनों ओर के लोगों के खून से कई जगह की जमीन रक्त रंजित होने लगी थी | उन्मादी लोगों की भीड़ बिना कुछ सोचे समझे मरने मारने पर आमादा थी जैसे उनके सोचने समझने की शक्ति ही समाप्त हो गयी हो |
                                         आस मुहम्मद  उस दिन आसाराम के काम से ही उसके घर पर गया था | जब उसे इस घटना का पता चला तो वह दौड़ा दौड़ा घटनास्थल पर  आया | दोनों गाँव के लोगों को इस तरह लड़ता देखकर वह हतप्रभ रह गया |  उसने दोनों तरफ के लोगों को समझाने का भरसक प्रयास किया , उनके हाथ पैर जोड़े , पैरों में पड़ा, रोकने की हर कोशिस की    पर बहशी भीड़ में  उसकी किसी ने नहीं सुनी | इसी बीच बचाव करने में  उसके पेट में किसी ने बल्लम से प्रहार कर  दिया और वह घायल होकर  बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा | इसी दौरान  किसी ने पास के पुलिस थाने  को खबर करदी | गनीमत रही की पुलिस जल्दी ही घटना स्थल पर आगयी और लोगों को झगडा बंद करने के लिए ललकारा | उसका असर न होने पर  पुलिस ने  हवाई फायर किये जिससे  भीड़ तितर बितर होगयी | और पुलिस झगडा बंद करने में कामयाब होगयी |  तब तक कई लोग घायल हो चुके थे जिन्हें पुलिस वालों ने पास के अस्पताल पहुँचाया | कस्बे का  अस्पतालथा जिसमें इतने लोगों की चिकित्सा करने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी | घायलों का काफी खून बह चूका था  जिसके कारण पांच लोगों ने खून अधिक  बह जाने और खून चड़ने की त्वरित व्यवस्था न हो पाने के कारण  दम  तोड़ दिया |  मरने वालों में  दो लोग  एक गाँव के और तीन लोग दूसरे गाँव के थे | कई लोग गंभीर घायल थे जिनमें आस मुहम्मद भी शामिल था |
                                                                 घटना का विवरण सुनकर  आसाराम बहुत दुखी हुआ | उसे पश्चाताप हो रहा था कि घटना के  दिन वह गाँव में क्यों नहीं रहा | उसे लग रहा था कि वह होता तो आस मुहम्मद के साथ मिलकर जरूर लोगों को समझा लेता और यह दुखद घटना टल सकती थी | उसने स्वप्न  में भी  नहीं सोचा था कि आपसी भाई चारे से रहने वाले पडौसी गावों के लोग इस तरह जानवर बन जायेंगे | पर हुआ वही जो नियति को मंजूर था |   अब उसने सोच विचारकर  निश्चय किया कि उसे क्या करना चाहिए और क्या  करना है |
                                                        आसाराम पुलिस अधिकारीयों के पास गया|  अपना परिचय देकर पुलिस वालों से बात की तथा अपना उद्देश्य बताया | पुलिस वालों की मदद से दोनों गाँवों के समझदार लोगों को बुलाया तथा उनसे बात की | उन लोगों को बताया कि मंदिर और मस्जिद दोनों में मांस डालने का काम किसी शरारती असामाजिक तत्व का काम था जो दोनों गाँव के लोगों के आपसी मेल मिलाप भाई चारे को  भंग करना चाहता था | झगडे के समय तो लोगों की बुद्धि कुंद हो गयी थी पर जब पुलिस के हस्तक्षेप से दंगा बंद होगया था तो दोनों पक्ष के लोगों को यह बात पता चल चुकी थी कि मंदिर और मस्जिद दोनों में मांस के टुकड़े रखकर किसी घ्रणित मानसिकता के व्यक्ति ने ही यह षड्यंत्र किया था | इसलिए अपनी भूल से सब लोग पहले ही अवगत हो चुके थे | इसलिए जब दोनों पक्ष के समझदार लोग आपस में मिले तो उन्हें समझाने में आसाराम को अधिक मेहनत नहीं करनी पडी | गयी  दोनों गाँव के पन्द्र्ष बीस लोगों की एक सद्भावना समिति बनायीं जो आसाराम की अगुआई में  घायलों को देखने हॉस्पिटल पहुंची और लोगों की चिकित्सा का उचित प्रबंध करवाया | आस मुहम्मद के विषय में डाक्टरों ने बताया कि इनकी चोट घटक तो नहीं है पर खून बह जाने के कारण खून की कमी होगयी है अतः  तुरंत खून चढाने की आवश्यकता है  | संयोग से आस मुहम्मद और आसाराम दोनों का खून एक ही ग्रुप का था | आसाराम ने खून देकर अपने मित्र आस मुहम्मद की जान बचायी |

                                                   अब हॉस्पिटल में भारती सभी लोग स्वस्थ होकर वापस आ चुके हैं | अनजाने और बिना सोचे विचारे निर्णय लेने से दोनों गांवों के मध्य जो अविश्वास पैदा हुआ था उसे आसाराम और आस मुहम्मद ने कई बार लोगों को एक जगह इकठ्ठा करके और मीटिंग करायी है जिससे पुनः पुराणी स्थित वापस आने लगी है |   इस घटना के बाद जो  समिति बनी थी  वह न केवल दोनों  गाँव के झगड़ों का समाधान करती है बल्कि  जन कल्याण के अन्य काम भी अपने हाथ में लिए हैं | गाँव की गलियों की साफ सफाई करने , शौचालयों का निर्माण करवाने और परिवार को सीमित रखने की शिक्षा भी लोगों को इसी समिति के लोग देते हैं जिसे गाँव वालों ने मानकर विकास के कई काम किये भी हैं | मुस्लिम आबादी वाले गगनव में भी परिवार नियोजन व पढाई लिखाई का महत्व लोग समझने लगे हैं जिसका उनके जीवन पर प्रभाव पड़ने लगा है |       

Wednesday, August 17, 2016

Prahasan

आज रात्रि मैंने एक  विचित्र सपना  देखा क़ि मुझे मच्छरों की बोली समझने की शक्ति प्राप्त हो गयी है । मुझे बाहर से मच्छरों की आवाज का शोर सुनाई दे रहा था और लग रहा था जैसे आस पास कोई बड़ी सभा हो रही हो । देखा क़ि मेरे किचिन गार्डन में मच्छरों की एक मीटिंग   चल रही है । वक्ता  लोग अपनी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे हैं । मलेरिया फ़ैलाने से लेकर डेंगू फ़ैलाने तक सबका व्यौरा पेश किया जा रहा है । तभी एक वक्ता अपने द्वारा फैलाये गए डेंगू का स्कोर बताते हुए मूंछों पर ताव देता है और ऐसे मच्छरों को पद्मश्री जैसे किसी सम्मान को देने की मांग करने लगता है । उसके इस प्रस्ताव का उपस्थित मच्छरों के भीड़ ध्वनिमत से जोशीला समर्थन करती है  । इसके बाद मंच पर आकर संचालक  घोषणा करता है   क़ि अब मीटिंग में अध्यक्ष महोदय द्वारा  इस साल की उपलब्धियों का विवरण प्रस्तुत किया जायेगा । सभी से शांति बनाये रखने की अपील करता है  । तभी एक नेतानुमा मच्छर अपनी लिखित रिपोर्ट हाथ में लिए प्रकट होता है और अपना सम्बोधन प्रारम्भ करता है ।
             भाइयो और बहनो हमारे संगठन द्वारा इस वर्ष रूटीन कार्यों के अतिरिक्त एक विशेष अभियान चलाया गया है । कुछ वर्ष पूर्व ही खोजी गयी डेंगू नामक ब्रह्मोस मिज़ाइल का  प्रयोग राजधानी दिल्ली में प्राथमिकता से  करने का महत्वाकांक्षी निर्णय लिया  गया है । हमारे मच्छर संगठन को यह डिसीजन इसलिए लेना पड़ा क्योंकि  दिल्ली की केंद्रीय सरकार में एक ऐसा आदमी  प्रधानमंत्री बन गया है जो हमारी कौम के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकता है ।  यह आदमी   सब जगह साफ़ सफाई  रखने की सलाह देता है और इसके लिए पूरे मानव समाज में जागरूकता लाने की बात करता है  यदि उसकी बात लोगों ने मानली तो समझो हमारी मच्छर जाति के समक्ष गंभीर समस्या उत्पन्न हो जायेगी यहां तक क़ि हमारी जाती का  अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा । इससे पहले जो पार्टी सत्ता में थी उसने ऐसे आदमी को प्रधानमंत्री बनाया था जो ऐसी छोटी मोटी  बातों की कोई चिंता नहीं करता था परिणाम ये था क़ि फैसले भी फटाफट होते थे । बस  पत्रावली हाईकमान से टिक होकर आई तो समझो प्रधान मंत्री के भी  दस्तखत  होगये । हाईकमान भी रॉयल किस्म का था उनका काम होता  रहे फिर रोग फैले या गन्दगी  उनको कोई मतलब नहीं रहता था । मानवों का यह नया नेता तो खुद साफ़ सफाई करने लगता है झाडू हाथ में उठा लेता  है और फिर सबसे अपने आस पास सफाई रखने की बात करता है । आप लोग सोचिये अगर ऐसा होगया तो हम मच्छरों को तो मुंह छुपाने की जगह भी नहीं मिलेगी । इसलिए हमने तय किया है क़ि आक्रामक रुख अपनाया जाय जिसके तहत डेंगू मिसाइल से सुसज्जित हमारे  सभी खतरनाक कमांडो राजधानी दिल्ली में ही डेंगू फ़ैलाने का कार्य करें । और हमें यह बताते हुए हर्ष हो रहा है क़ि इसके बहुत अच्छे परिणाम सामने आये हैं तथा दिल्ली में चारों ओर  हमारा डंका बज रहा है । दिल्ली के राजनीतिक हालात भी हम मच्छरों के पक्ष में हैं क्योंकि केंद्र सरकार और राज्य सरकार एक दूसरे को ही दोषी ठहराने में लगी रहतीं हैं उन्हें बचाव करने में विशेष रूचि नहीं है । उसने यह भी घोषणा की क़ि हमारा अगला लक्ष्य  बिहार होगा क्योंकि लोगों के चुनाव में व्यस्त होजाने पर वहां डेंगू फ़ैलाना आसान रहेगा और हमारे मच्छर लोग अपना काम निर्बाधरुप से करते रहेंगे ।
           इसके बाद डेंगू फ़ैलाने में सर्वाधिक सफल मच्छरों का स्वागत किये जाने का कार्यक्रम  शुरू होगया । उनको मंच पर  बुला बुलाकर प्रशस्तिपत्र दिए गए । जिस मच्छर ने सबसे अधिक लोगों में डेंगू फैलाया था उसे स्वर्णपदक देकर उसकी उपलब्धि की सराहना करने के पश्चात् उससे अपने अनुभव व तरीके सबको बताने के लिए कहा गया जिससे उसके अनुभव का अन्य  मच्छर लाभ उठाकर अधिक प्रभावी हो सकें  । अपने अनुभव साझा करते हुए उस  पुरुष्कृत मच्छर का कहना था क़ि मनुष्यों को हमारी यह गोपनीय बात क़ि डेंगू का मच्छर रात में नहीं काटता है लीक होगयी थी जिससे वे दिन में सतर्क रहने लगे थे  । पर उसने रात के अँधेरे में ही कई मनुष्यों का शिकार किया और मनुष्यों की सतर्कता को नाकाम कर दिया । प्यार और दुश्मनी में सब जायज होता है यह मनुष्यों का बनाया हुआ ही नियम है जिसका प्रयोग उसने उन्हीं के विरुद्ध किया था  । सभा में उपस्थित मच्छर समुदाय ने उसकी बुद्धिमत्ता और प्रतिउत्पन्नमति की करतलध्वनि से भूरि भूरि प्रसंशा की थी ।
                   नींद खुलने पर मैं काफी समय तक समझ ही नहीं पाया था क़ि यह सब क्या हो रहा था । इस घटना की पुष्टि हेतु मैं अपने  गार्डन की ओर दौड़ा जाकर देखा तो वहां  पर ऐसा कुछ भी दिखाई नही दिया था ।
         


Wednesday, March 30, 2016

मीठा चन्दा

मीठा चंदा

        भरे पूरे परिवार की वयोवृद्ध महिला के रूप में जिंदगी गुजार रहीं दादी भगवती  देवी यही कोई सत्तर के आस पास की रहीं होंगीं | उनहोंने अधिकांश समय सरकारी सेवारत दादा जी के साथ विभिन्न  स्थानों पर रहकर गुजारा है |  जब से दादा जी  सेवानिवृत्त हुए हैं  तब से वे  अपने बनवाये घर में एक ही शहर में रह रहीं हैं | सीदी सादी  महिला हैं | अधिक पढी लिखी नहीं हैं जो अख़बार  या किताबें पढकर समय गुजार सकें | हाँ खडी बोली बोल लेती हैं | टीवी देखना अच्छा नहीं लगता है क्योंकि आजकल टीवी पर जैसे सीन दिखाए जाते हैं वे उन्हें कतई पसंद नहीं हैं | अपने बच्चे बड़े हुए | उनकी पढाई लिखाई पूरी होते देखी | अब शादीसुदा होकर वे भी बाल बच्चेदार होगये हैं | घर में दो दो बहुयें हैं जिन पर दो दो तीन तीन बच्चे भी हैं | पोते पोतियाँ भी बड़े होने लगे हैं | बल्कि एक पोती की अभी शादी हुई है जिसके कारण  दोनों बेटे अपने परिवार के साथ आये हुए हैं बरना वैसे तो वे अपने अपने  बच्चों के साथ अलग अलग शहरों में ही  रहते हैं | घर पर दादाजी के साथ वे अकेले ही रहतीं हैं |
                                                            पोती के विदा हुए तीन चार दिन ही बीतें हैं | वे अपने कमरे में  बैठीं थीं कि अचानक पोती ने आकर दादी से पूंछा , “ दादी आप हनीमून पर कहाँ गयीं थीं |”  यह पोती तीसरी क्लास में पढ़ती है | उसकी कजिन दीदी जिसकी शादी हुई है उसका फोन आया था वह  अपने हनीमून पर विदेश जाने की सूचना अपनी मम्मी को दे रही थी | उसी को सुनकर पोती  दादी के पास आई है | दादी का उत्तर न मिलने पर पोती ने अपनी बात फिर दोहराई | पर दादी कुछ समझ नहीं पायीं | तभी बड़ी बहू कमरे में किसी काम से आई थी  जिसने पोती की बात सुनली थी | उसने दादी को बताया कि अभी प्रियंका का फोन आया था उसने बताया है कि राकेश उसे हनीमून के लिए स्विट्जरलैंड ले जा रहा है | बड़ी बहू ने फोन मिलाकर प्रियंका से दादी की भी बात भी  करा दी | प्रियंका ने प्रसन्न होते हुए दादी को बताया कि दादी राकेश बहुत अच्छा है वह उसे हनीमून पर विदेश ले जा रहा है |
                          पोती व बहू जा चुकीं थीं पर दादी को अभी भी बात पूरी तरह समझ में नहीं आई थी | पोती द्वारा फोन पर अपने पति का नाम लेकर राकेश ले जा रहा है कहना भी उन्हें अटपटा लग रहा था | उन्होंने तो हमेशा दादा जी को सुन्दर के पापा कहकर ही बुलाया था | सुन्दर उनका बड़ा बेटा जो  है | बहुओं को भी अपने पतियों का नाम लेते नहीं सुना था | बहुएं “ ये “ कह रहे थे “ वो “ कह रहे थे आदि कहकर ही काम चला लेती थीं | पर  आज कल की लडकियों को क्या कहें पल्लै करती हैं | फिर हनीमून तो वे बिलकुल नहीं समझीं थीं | दादी इसी उधेड़बुन में थीं कि उन्हें याद आया कि जब शादी के बाद पहलीबार वे दादा जी साथ  आगरा आयीं थीं तो वे ताजमहल पर चमकी दिखाने ले गये थे | चांदनी रात में सफेद संगमरमर से बना ताजमहल देखकर उन्हें बहुत अच्छा लगा था | ताजमहल के सामने पत्थर पर बैठकर दादा जी के साथ फोटू भी खिचवाया था जो सबको बहुत पसंद आया  था | पर अब वह फोटू कहाँ चला गया पता नहीं | चमकी के बारे में पूंछने पर दादा जी ने समझाया था कि चांदनी रात यानी मून लाईट में ताजमहल देखने को ही चमकी कहते हैं | तो उन्हें याद आया कि मून का मतलब चंदा और लाईट तो वे रोज अपने कमरे में जलती हुई देखती ही हैं | पर हनी का अर्थ वे अभी भी नहीं समझ पायीं थीं |
                                                                        तभी उनका पोता जो सातवीं क्लास में पढता था , संयोग से उसी समय कमरे में आया | दादी ने पोते को अपने पास बिठाया और परीक्षा लेने के अंदाज में उससे हनी का अर्थ पूंछ लिया | अब दादी जान गईं थीं कि हनी का मतलब शहद होता है | पर शहद और चंदा का क्या सम्बन्ध यह उलझन अभी भी बनी हुई थी | दादी ने जवानी में चमकी देखी थी उसका सुखद अनुभव अभी भी उनके स्मृति पटल पर विद्यमान था | चांदनी रात में चंदा की रोशनी में ताजमहल के परिसर में दादा जी के साथ घास के मैदान में बैठकर  खायी गयी कुल्फी का मधुर स्वाद उनको पुनः स्मरण हो आया था | अब दादी ने अर्थ निकाला कि हनी का मतलब मीठा और हनी मून का मतलब मीठा चंदा ही होना चाहिए | उन्हें लगा यह कोई अनोखी चीज है जिसे वे अपनी जिंदगी में देखने से चूक गयी हैं | तभी तो लोग विदेशों तक में उसे देखने जाते हैं | दादी ने तय  किया कि जो गलती हुई है उसे सुधारने के लिए वे दादा जी से बात करेंगीं | दादा जी अभी भी उनकी कोई बात नहीं टालते थे और वे जो चाहतीं थीं वही चीज लाकर दे देते थे | दादा जी को अच्छी खासी पेंसन मिलती थी वे किसी के आश्रित तो  थे नहीं  |
                                   दादी ने देखा कि दादा जी ड्राइंग रूम में अनुलोम विलोम करने में लगे हैं | यद्यपि योग करते समय दादा जी किसी से बात नहीं करते थे पर दादी की उत्सुकता इतनी अधिकबढ़ चुकी  थी कि वे अधिक  प्रतीक्षा नहीं कर सकती थीं | इसके आलावा उनको यह भी डर था कि जो बात वह कहना चाह रहीं हैं उसे कहीं भूल न जाएँ क्योंकि आजकल बातों को भूल जाने की बीमारी सी भी  उन्हें लग चुकी थी | कमरे में जाते ही उन्होंने कहा , “ सुन्दर के पापा तुमने हमें कभी हनीमून नहीं दिखाया है क्यों न अब कहीं चलकर हनीमून देखलें |” दादा जी पढ़े लिखे थे |  वे सब जानते समझते थे | दादी की बात सुनकर  उन्हें हंसी आ गयी | उधर देखा कि बगल के कमरे में खडी बड़ी बहू ने दादी की बात सुन ली है और वह अपनी हंसी दबाती सी किचिन में चली गयी है जहां से दोनों बहुओं के हंसाने की आवाज किचिन से आ रही है | दादा जी को अब हंसी के साथ साथ संकोच भी हो रहा था | वे हलकी फुलकी डांट देने के अंदाज में बोले , “ सुन्दर की मम्मी तू क्या कह रही है |  इसका अर्थ भी जानती है ‘ | दादी पूरी जानकारी करके आयीं ही थी इसलिए  निसंकोच बोलीं , हनीमून माने मीठा चंदा | आप तो मुझे बिलकुल ना समझ ही समझ रहे हो | क्या मैं इतना भी नहीं जानती | हनीमून माने मीठा चंदा |”
                                          अब तक यह बात बहुओं के माध्यम से परिवार के सभी सदस्यों में फ़ैल चुकी थी \ सभी लोग कमरे में इकट्ठे होकर ढहाके लगाकर हंस रहे थे | पर दादी की समझ में नहीं आ रहा था कि मीठा चंदा  कहकर उन्होंने ऐसा क्या कह दिया है जिससे सभी लोग उनका  मजाक बना रहे हैं |

Thursday, December 24, 2015

भाई चारा

भाई चारा
भूरे व मुन्ना की  जान पहिचान  विचित्र परिस्थिति में हुई थी  | हुआ यह था कि  जब पहलीबार मुन्ना काम  की खोज में कसबे में आया तो नयी जगह को देख भौचक था | उसकी कोई न तो उस कसबे में जान पहिचान  थी और न कोई रिश्तेदारी | वह तो हालातों का मारा घरवालों से लड़ भिड़कर चला आया था |
                              वह बारहवीं तक अपने गांव के पास के कालेज में पढ़ा था और पढ़ने के मामले में वह काफी होशियार भी मना जाता था , परन्तु आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण घरवाले उसकी आगे की पढाई जारी  नहीं रखवा पाए थे तथा छोटी उम्र में ही उसकी शादी करके वे अपना फर्ज पूरा करना मान बैठे थे | शादी शुदा होने पर अपने साथ बीबी बच्चों की भी जरूरतें पूरी करने में आर्थिक तंगी आढे  आने लगी थी | घर की  मारी हालत ऐसी न थी कि  उसे उसके निजी खर्चों के लिए कुछ मिल पाता , घरवालों से झगडा होने का मुख्य  कारण भी  यही था |
                                   घर से चलते समय उसने  सोचा था कि कोई ना कोई काम  मिल ही जायेगा और उसकी दिनचर्या चल निकलेगी | एक दो दिन  यहीं रेलवे स्टेसन पर रात गुजार चुका था पर लाख कोशिश के बाबजूद उसे कोई काम नहीं मिल पाया था |  अब उसकी अंटी भी ढीली होने लगी थी | काम की  तलाश में वह ऐसे  ही घूम  रहा था कि उसने देखा  सड़क पर एक आदमी को कई मुस्टंडे पीट रहे हैं  | पिटनेवाला   बेचारा स्वयं को  उनसे अपनी रक्षा कर पाने में असमर्थ पा  रहा था परन्तु आस पास उपस्थित भीड़ और आने जाने वाला कोई भी व्यक्ति  उसकी सहायता के लिए आगे  नहीं आ  रहा था | मुन्ना ने जब यह देखा तो अपनी स्वाभाविक आदत के अनुसार उस व्यक्ति के बचाव में कूद पड़ा | थोड़ी देर की हाथापाई  के बाद उस को वह बचाने में  सफल हो गया | मुस्तंडे मुन्ना के आगे बेबस होकर भूरे को छोड़  कर भाग खड़े हुए  थे | किसी एकदम अनजान व्यक्ति के द्वारा अपनी जान जोखिम में डालकर उसके बचाव करने से भूरा  बहुत प्रभावित हुआ था  और आभार व्यक्त करते हुए उसके बारे में जानकारी की थी  | अंत में यह पता लगने पर कि  उसकी  जान पहिचान का यहाँ कोई   नहीं है और वह काम की  तलास में कसबे में  आया है , उसे अपने घर लेगया था |
                            वह दिन है कि आज दोनों की दोस्ती गहराती गयी है | यहाँ तक कि  अब तो उनके परिवार एक दूसरे से इतने घुल मिल गये है कि परिवार में खुशी या गम का कोई भी मौका हो मुन्ना व भूरे साथ साथ ही दिखाई देते हैं | उनकी दोस्ती की कसबे में मिसाल दी जाने लगी है | लोग यह जानने में भूल कर जाते है कि मुन्ना मुन्ना सिंह है या मुन्ने खान और भूरे जिसका पूरा नाम भूरे खान है , उसको भूरे सिंह समझ बैठते हैं |
                                                  मुन्ना को याद  है कि जब वह भूरे के साथ उसके घर पहुंचा था तो घर के लोगों का पहनावा खासकर औरतों के बुरखे  को देखकर वह जान पाया  था कि भूरे हिंदू नहीं मुसलमान है और अनजाने में ही उसने मुसलमान की सहायता की है | पर उसका दिल यह मानने को तैयार नहीं था कि  ऐसा करके उसने कोई गलत काम किया है | उसे लग रहा था कि उसमें और भूरे में कोई फर्क नही  है बल्कि  भूरे भी उसकी ही तरह हाड  मांस का बना इंसान है | फिर भूरे की आत्मीयता और सहायता  करने के एवज में दिखाई गयी सज्जनता  उसे अपने निर्णय को उचित मानने के लिए प्रेरित कर रही थी | उसके अपने गाँव में कोई मुसलमान  नहीं था और उसने दूसरों से मुसलमानों के बारे में जितना सुना था वह उसके दिमाग में था | परन्तु भूरा और उसके घरवालों का अच्छा व्यवहार उसकी पुरानी  धारणा को गलत सिद्ध  कर रहा था | उसका कसबे में अन्य  कहीं ठिकाना भी नहीं था इसलिए मन में कुछ दुविधा की स्थिति होने के बाबजूद वह भूरे के उसी  के घर रुकने के आग्रह को अस्वीकार नहीं कर पाया था |
                          देखो मुन्ना ये तुम्हारी भाभी जान हैं , वह मेरी अम्मी जान और बैठक में बैठे अब्बा जान हैं ......... भूरे ने जब अपनी पत्नी , मम्मी और पिताजी से उसका परिचय कराया था तो उसके हाथ अनायास ही अभिवादन के लिए जुड  गये थे | भाभी जान ने चाय का प्याला पकडाते  हुए उसके घर परिवार के विषय में पूछने पर वह कोई झूट नहीं बोल पाया था | और देखते ही देखते दो चार दिन में ही भूरे की माँ उसे अपनी अम्मी जान सी ही लगने लगी थी | भूरे ने उसे अपनी जान पहिचान के एक कारखाने में काम दिलवा दिया था जिसे वह मेहनत  से करने लगा था | दो चार महीने बाद ही कुछ कमाई करके जब वह अपने गाँव गया तो अपनी पत्नी व बच्चों के साथ ही लौटकर आया था | भूरे ने गाँव जाने से पहले ही उसे पडौस की एक कलौनी में किराये पर मकान दिलवा दिया था जिसमें उसका परिवार रहने लगा था |
                                     मुन्ना को याद  है कि जब भूरा के संपर्क में आने के बाद पहलीबार वह अपने गाँव गया और अपने परिवार वालों और जान पहिचान वालों को अपने दोस्त भूरा के मुस्लिम होने के बारे में बताया तो किसी की  भी पहली प्रतिक्रिया अच्छी नहीं थी | हिंदू समाज में मुसलमानों के सम्बन्ध कई प्रकार के पूर्वाग्रह हैं जो सच्ची झूंटी सुनी सुनाई बातों पर आधारित हैं | यद्यपि यह सच  नहीं है क्योंकि अच्छे और  बुरे लोग हर समाज में होते हैं अतः पूरे  समाज के लिए एक जैसी अवधारणा बना लेना अक्सर गलत ही होता है | मुसलमानों के प्रति हिंदुओं की ऐसी सोच के पीछे कुछ ऐतिहासिक घटनाओं का भी हाथ है पर वे उन विदेशी आक्रांताओं के विषय में ही सही है जो  देश में लूट पाट  करने के उद्देश्य से ही आये  थे | आज के अधिकांश मुस्लमान इस देश की मिटटी से पैदा हुए हैं और इस देश की  ही संतान हैं और अधिकांश के पूर्वज भी हिन्दुस्तानी ही थे | जो विदेशी मूल के भी हैं वे भी शदियों  से इसी देश में रहते रहते पूरी तरह  हिन्दुस्तानी होचुके  है | अतः अब यह देश जितना हिंदुओं का है उतना ही मुसलमानों का भी है | मुन्ना भूरे व उसके परिवार वालों के अच्छे व्यवहार को देख चुका था और उससे पूरी तरह प्रभावित था अतः जब कोई भी उनके प्रति शंका जाहिर करता तो मुन्ना उसे उनके वर्ताव के विषय में बताकर और उनकी अच्छाइयां गिनाकर उन्हें निरुत्तर कर देता था |
                                      भूरे के पांच  बच्चे थे जिनमें उम्र का बहुत कम अंतर था | बल्कि हर एक सवा साल के बाद भूरे की  पत्नी माँ बन जाती  थी | जल्दी जल्दी बच्चे होने और घर कि मारी हालत  ठीक न होने के कारण भूरे की  पत्नी जवानी में ही बूढी सी दिखाई देने लगी थी | अपनी पत्नी के माध्यम से जब एक बार उसे यह मालूम हुआ कि भाभी जान तो उम्र में उसकी पत्नी से भी एक दो साल छोटी हैं तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ | उसने अधिक बच्चे होने और जल्दी जल्दी बच्चे होने से उत्पन्न बुरे परिणामों के  विषय में भूरे से बात की और यह मानते हुए कि भूरे शायद पढ़ा लिखा नहीं है उसने  इस स्थिति को शिक्षा के अभाव से जोड़ते हुए उसे समझाया | परन्तु जब उसने जाना कि भूरे भी मैट्रिक तक  पढ़ा है तो उसने  उससे इस विषय में खुलकर बात की | अपनी पत्नी से कहकर भाभी जान को भी जल्दी जल्दी और अधिक बच्चे होने की हानियों के बारे में समझाया | किसी तरह भूरे व उसकी पत्नी तो इस बात को मान  गये कि परिवार का छोटा होना और बच्चों में तीन चार साल का अंतर होना अच्छी बात है , परन्तु भूरे की  अम्मी यह मानने को तैयार न  थी | उनका कहना था कि इस्लाम में बच्चों को रोकना नाजायज है और यह कि बच्चे तो अल्ला की नेमत होते हैं और जो अल्ला के विधान में दखल देता है वह दोजख का भागी होता है ...... आदि आदि |
                        एक दिन अवसर देखकर मुन्ना ने भूरे से इस बिंदु पर फिर  बात की और कहा कि  वह यह बताए कि किस धार्मिक ग्रन्थ में ऐसा लिखा है कि परिवार नियोजन इस्लाम के खिलाफ है | उसने यह भी कहा कि उसने इसी उद्देश्य से कुरान पूरी पढकर देखी है उसमें ऐसा कोई उल्लेख उसे नहीं मिला है | भूरे खुद इतना  पढ़ा लिखा था उसने भी कुरान को अच्छी तरह पढकर देखा परन्तु ऐसी कोई बात कुरआन में लिखी नहीं मिली | अब तो वह इस बात से आश्वस्त होगया कि उसके समाज में कई बातें केवल अन्धविश्वास के रूम में प्रचलितN  हो गयीं हैं जबकि धार्मिक उपदेशों में ऐसा कहीं नहीं है | उसने अपने अब्बा जान को विश्वास में लेकर अम्मी जान को भी समझा लिया और सरकारी अस्पताल जाकर पत्नी का परिवार नियोजन का आपरेशन करा लिया | फिर तो वह परिवार नियोजन के लाभों से अन्य लोगों को भी समझाने लगा और इसके बाद उसने  कई मिलने वालों मुसलमान भाइयों  को समझाकर आपरेशन के लिए राजी किया |    
                                                       मुन्ना व भूरे दोनों प्रगतिशील विचारों के व्यक्ति बन चुके थे और सामाजिक कार्यों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने लगे थे | दोनों ने मिलकर प्लास्टिक के डिब्बे बनाने की एक छोटी फैक्ट्री लगा ली थी जिसके लिए बैंक से ऋण ले लिया था | इस प्रकार दोनों मित्रों के परिवार शांति व सुखपूर्वक रहने लगे थे | उन दोनों की दोस्ती लोगों के लिए मिसाल बन गयी थी |

चिकना घड़ा

कहते हैं चिकने घड़े पर पानी नहीं रुकता है । वैसे तो यह एक मुहावरा मात्र है पर जब ये मुहावरा देश की सबसे पुराने राजनीतिक दल पर लागू होता हो तो यह चिंता का विषय बन जाता है । कांग्रेस पार्टी द्वारा सदन नहीं चलने दिया गया और मोदी सरकार को gst जैसे महत्वपूर्ण बिल को जानबूझकर पास नहीं होने दिया गया । कांग्रेस पार्टी एक ओर कहती है कि gst तो उनका ही लाया गया बिल है परंतु अपने निहित स्वार्थ के कारण उसे पास नहीं होने देती । सदन न चलने देने के नित नए बहाने खोजे गए और दोनों सदनों में हंगामा किया गया । प्रिंट मीडिया में रोज संपादकीय लिखकर आलोचना होती रही  , इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी तीखी बहस चली पर कांग्रेस पार्टी पर इन सबका कोई असर नहीं हुआ । ऐसा लगता है जैसे पार्टी पर अब किसी आलोचना का कोई प्रभाव नहीं होता है । उसके नेता अंधे बहरे हो गए हैं जिन्हें कोई टीका टिप्पड़ी सुनाई नहीं देती । यह स्थिति लोकतंत्र के लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है ।
                            नेशनल हेराल्ड के मामले में कोर्ट का नोटिस आने के बाद सोनियां और राहुल अपना संतुलन खो बैठे और सीधे सरकार को ही इसके लिए कोसने लगे । इस मुद्दे को लेकर कई दिन तक सदन की कार्यवाही बाधित की गयी  जबकि तथ्य यह है कि इस कोर्ट केस में सरकार या सत्ताधारी पार्टी का कोई हाथ नहीं है । यह केस भी 2013 में दर्ज किया गया था जब बीजेपी सत्ता में नहीं थी और केस दायर करने वाले सुब्रमंयम स्वामी बीजेपी के सदस्य भी नहीं थे । इससे यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस पार्टी को न तो न्यायपालिका पर विश्वास है और न देश की सर्वोच्च पंचायत सदन पर ही । इससे यह भी पता लगता है कि गांधी परिवार के सामने पूरी पार्टी कितनी नि सहाय है । वस्तुतः कांग्रेस पार्टी गांघी परिवार के चाटुकारों का एक समूह मात्र हो ऐसा प्रतीत होने लगा है ।
अन्य विपक्षी दलों ने भी कांग्रेस पार्टी के गलत कदम का जिस तरह समर्थन किया और देश हित को भी उपेक्षित कर दिया यह देश की जनता के लिए गहन चिंता का विषय है । अब समय आज्ञा है कि संविधान में ऐसी अराजक स्थिति से बाहर निकलने  का कोई समाधान खोजा  जाय ।  इसके लिए राज्य सभा की शक्तियों को सीमित करने पर भी विचार किया जा सकता है क्योंकि जनता द्वारा सीधे चुना गया सदन लोक सभा ही है । ऐसी व्यवस्था की जाय जिससे लोक सभा द्वारा पारित कोई बिल राज्य सभा न रोक पाये । अन्यथा  अराजकता की यही स्थिति बनी रहेगी और देश को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है ।

किसान नेता चौधरी चरण सिंह

23 दिसंबर पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी  चरण सिंह का जन्म दिवस है । वे  अपनी ईमानदारी , स्पष्टवादिता , दृढ़ता , और ग्रामीण भारत के हितों के कट्टर प्रवक्ता के रूप में जाने जाते थे । मध्य जातियों के लोगों को राजनीतिक में  जागरूक व सक्रिय बनाने का श्रेय उन्हीं को जाता है । उनके समर्थक रहे व उनकी पार्टी से निकले नेताओं की लम्बी फेहरिस्त है जो आज विभिन्न राजनीतिक दलों के  प्रभावी नेता हैं । आगरा कालेज से पोस्ट ग्रेजुएट व ला ग्रेजुएट चौधरी चरण सिंह 1937 में प्रोविंसिएल असेंबली के लिए मेरठ की छपरौली सीट से चुने गए । 1938 में उन्होंने किसानों के हित के लिए एग्रीकल्चर प्रोडक्ट प्राइस बिल प्रस्तुत किया जो यूपी में लागू  होने के बाद देश के कई राज्यों ने भी लागू किया था । गांधी जी के विचारों से प्रभावित होकर वे  स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े और जेलयात्रा भी करनी पड़ी । स्वतन्त्र भारत में 1950 में यूपी में  गोविन्द वल्लभ पंत की कांग्रेस सरकार में राजस्व मंत्री रहते हुए  उन्होंने क्रन्तिकारी भूमि सुधार क़ानून बनाकर उसे  लागू  कराया जो देश में इस तरह का पहला कानून था ।
                   राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार उस  समय प्रसिद्धि पायी  जब 1959 के नागपुर अधिवेशन में उन्होंने  कांग्रेस के सर्वेसर्वा और देश के प्रधानमंत्री नेहरू जी  के सहकारिता खेती के प्रस्ताव का दृढ़ता से विरोध किया क्योंकि वे जानते थे कि किसानों का अपनी जमीन से भावनात्मक लगाव होता है और सहकारिता खेती भारतीय किसानों के लिए उपयुक्त नहीं थी । इस विरोध का खामियाजा उनको कांग्रेस पार्टी में अपना महत्व कम होने के रूप में  भुगतना पड़ा परंतु  वे अपने सिद्धान्तों पर अडिग रहे  । 1967 में उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़कर भारतीय क्रांति दल नामसे अपनी अलग पार्टी बना ली । इसके बाद वे दो बार उ0प्र0 के मुख्यमंत्री रहे । मुख्यमंत्री रहते हुए  अल्पकाल में ही उन्होंने प्रशासनिक दृढ़ता और भ्रष्टाचार विरोधी की जो छवि बनायी उसे आज भी लोग कहानी किस्सों की तरह याद करते है । वे कांग्रेस के विरोध में विपक्ष को एकजुट करने के प्रयास में अनवरत लगे रहे और इसी कड़ी में सोसलिस्ट पार्टी के मधु लिमये,  जार्ज फर्नाडीज आदि कई  नेताओं को शामिल कर के लोक दल नामक पार्टी बनायीं । स्वतंत्रता आंदोलन में जेलयात्रा के बाद उन्हें इंदिरा गांधी के आपातकाल में पुनः जेल जाना पड़ा क्योंकि इंदिरागांधी का गहन विरोध उनके कट्टर समर्थक राज नारायन द्वारा ही किया गया था । विपक्षी एकता की उनकी मुहिम जनता पार्टी के बनने के साथ अपनी चरम परिणीति  पर पहुंची ।
              1977 के लोक सभा चुनाव में जनता पार्टी को भारी  बहुमत मिला जिसमें उनकी पार्टी लोकदल का घटक सर्वाधिक प्रभावी था । जनता पार्टी ने लोकदल के ही चुनाव चिन्ह हलधर किसान को अपनाकर उस  पर चुनाव लड़ा था । पर उनकी अपनी नीतियों को कार्यान्वित करने के प्रयासों को उस समय गहरा धक्का लगा जब अपने समर्थकों का बहुमत होने के बाबजूद जयप्रकाश नारायण के प्रभाव के कारण  मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री चुना गया । फिर भी उस समय प्रांतीय सरकारों में यूपी , बिहार , हरियाणा , राजस्थान , दिल्ली , हिमाचल और उड़ीसा में उन्हीं की पार्टी से आये उनके समर्थक मुख्यमंत्री बने । चौधरी चरण सिंह जाट , यादव , कुर्मी , गूजर आदि जातियों के साथ साथ भूमिहार और त्यागियों में तो  लोकप्रिय नेता थे ही  बल्कि मुसलमानों का भी उन्हें व्यापक समर्थन प्राप्त था । इस प्रकार  मध्य जातियों को राजनीतिक पटल पर स्थापित करने और राजनीती की मुख्यधारा में लाने का श्रेय  उन्ही को जाता है ।
                   जनता पार्टी के शासनकाल में वे गृहमंत्री , वित्तमंत्री व उप प्रधानमंत्री रहे । गृहमंत्री के रूप में उनकी तुलना  सरदार पटेल से की  जाने लगी थी । जनता पार्टी में विघटन के बाद वे कांग्रेस के समर्थन से प्रधान मंत्री  बने । कांग्रेस पार्टी के समर्थन से प्रधानमंत्री बनने के उनके इस निर्णय की कुछ लोग आलोचना भी करते है परंतु वास्तविकता यह है कि कांग्रेस पार्टी द्वारा कुछ दिनों बाद ही अपने समर्थन के बदले  उसके नेताओं के विरुद्ध कोर्ट में चल रहे  आपातकाल के केसों को वापस  करने  की शर्त लगाई  उन्होंने प्रधानमंत्री के पद को ठुकराकर अपने पद से त्यागपत्र दे दिया और अपने सिद्धांतों से न झुकने का मार्ग अपनाया  ।
               जनता पार्टी के विघटन के बाद  उ0प्र0 में उन्होंने अपने पुत्र अजीत सिंह को  न चुनकर जमीन से जुड़े नेता मुलायम सिंह यादव को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी चुना था । परंतु उनके पुत्र की राजनीतिक अपरिपक्वता और वीपी सिंह की कुटिल चाल के कारण मुलायम सिंह व अजीत सिंह एक नहीं रह सके और उनका बनाया लोकदल परिवार अनेक टुकड़ों में विभक्त हो गया । उनके इस सपने के टूटने का ही परिणाम है कि अब तक कोई किसान हितचिंतक नेता प्रधानमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुँच  पाया  है । बिहार के कर्पूरी ठाकुर , नीतीश कुमार , लालू  यादव और शरद यादव , उ0प्र0 के राम नरेश यादव , राज नारायण , मुलायम सिंह यादव , के सी त्यागी , रशीद मसूद , हरियाणा के चैधरी देवी लाल , राजस्थान के कुम्भाराम आर्य , उड़ीसा के बीजू पटनायक आदि नेता उन्हीं की पार्टी से निकले हुए नेता हैं । ग्रामीण अर्थशास्त्र के गहन चिंतक व मर्मज्ञ  थे  इस विषय पर उनके द्वारा कई पुस्तकें भी लिखी गयी थीं ।